Bharatpur Princely State

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Bharatpur Princely State भरतपुर रियासत

भरतपुर राज्य की स्थापना सिनसिनी गाँव के जाटों ने की थी। राजस्थान के पूर्वी भाग-भरतपुर, धौलपुर, डीग आदि क्षेत्रों पर जाट वंश का शासन था। यहाँ जाट शक्ति का उदय औरंगजेब के शासन काल से हुआ था।

कहा जाता है की इसका नाम भरतपुर अयोध्यापति श्री राम के भाई भरत पर रखा गया है एवं उनका छोटा भाई लक्ष्मण भरतपुर राजवंश के कुलदेवता के रूप में पूजित थे वर्तमान में भी भरतपुर में लक्ष्मण जी का मंदिर स्थित है।     

औरंगजेब के काल में गोकुल, भज्जा व राजाराम के नेतृत्व में जाट संगठित होने लगे। 

औरंगजेब की मृत्यु के आसपास जाट सरदार चूड़ामन ने थून (डीग के पास) में किला बनाकर अपना राज्य स्थापित कर लिया था।

बहादुरशाह ने चूड़ामन को 1500 जात व 500 सवारों का मनसबरदार बनाया।

चूड़ामन के बाद उसके भतीजे बदनसिंह को जयपुर नरेश सवाई जयसिंह ने 1722 ई. में डीग की जागीर दी एवं ब्रजराजकी उपाधि प्रदान की । इस प्रकार एक नये जाट राज्य का गठन हुआ।

बदनसिंह ने डीग, कुम्हेर, भरतपुर तथा वैर में किले बनवाये।

बदनसिंह के पुत्र सूरजमल ने सोधर के निकट दुर्ग का निर्माण करवाया, जो बाद में भरतपुर के दुर्ग या लोहागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ बदनसिंह ने उसे अपनी राजधानी बनाया।

बीस वर्ष शासन के पश्चात इसने जीते जी अपने पुत्र सूरजमल को शासन की बागडोर सौंप दी। 1736 ई. को बदनसिंह की मृत्यु हो गयी।

जाटों का प्लेटों (अफलातून) या सिनसिनवार प्लेटो सूरजमल (जाट राजा) को कहा जाता है।

सूरजमल (जाट राजा) ने 12 जून, 1761 ई. को आगरे के किले पर अधिकार कर लिया और डीग के महलों का निर्माण करवाया।।

सूरजमल के शासन में अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया। पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) में बचे हुए मराठी सैनिकों को सूरजमल व उसकी महारानी किशोरी देवी ने रसद सामग्री उपलब्ध कराई।

सूरजमल के बाद उसका पुत्र जवाहरसिंह भरतपुर का राजा बना। उसने दिल्ली पर आक्रमण किया तथा विजय के उपलक्ष में लाल किले के दरवाजे को भरतपुर लेकर आया। इसने विदेशी लड़कों की एक पेशेवर सेना तैयार की।

अब्दाली के भारत से लौटने के बाद क्रमश: रतनसिंह, केशरसिंह व रणजीतसिंह शासक बने।

रणजीतसिंह के काल में मराठों व अंग्रेजों का आक्रमण हुआ।

भरतपुर दुर्ग को 1805 ई. में जनरल लेक डाउन वेल (अंग्रेज)  ने घेर लिया किन्तु उसे जीत न सका।

29 सितम्बर, 1803 ई. में रणजीतसिंह ने अंग्रेजों से सर्वप्रथम सहायक संधि कर ली।

महाराजा ब्रजेन्द्रसिंह आजादी के समय भरतपुर के शासक थे।

स्वतंत्रता के बाद भरतपुर मत्स्य संघ में विलय हुआ जो 1949 ई. में राजस्थान में शामिल हो गया।

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