Mughal policy towards the Rajputs:मुगलों की राजपूत नीति
Mughal policy towards the Rajputs:अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब की राजपूत नीति का तुलनात्मक अध्ययन मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मुगल–राजपूत संबंध केवल राजनीतिक गठजोड़ नहीं थे, बल्कि उन्होंने मुगल साम्राज्य की स्थिरता, विस्तार और प्रशासनिक सफलता में निर्णायक भूमिका निभाई। विशेष रूप से अकबर द्वारा अपनाई गई राजपूत नीति ने मुगल साम्राज्य को एक अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। समय के साथ यह नीति जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के काल में विभिन्न रूपों में विकसित और परिवर्तित होती रही।
अकबर की राजपूत नीति (1556–1605):Mughal policy towards the Rajputs
(क) पृष्ठभूमि
राणा सांगा, राव मालदेव, राव चन्द्रसेन और महाराणा प्रताप जैसे शासकों के संघर्षों के बाद 16वीं शताब्दी के मध्य तक राजपूत शक्ति बिखर चुकी थी।
- आंतरिक कलह
- योग्य नेतृत्व का अभाव
- परस्पर संघर्ष
इन परिस्थितियों ने अकबर को राजपूताना में हस्तक्षेप का अवसर प्रदान किया।
(ख) वैवाहिक संबंधों की नीति
अकबर ने राजनीतिक वैवाहिक संबंधों को सहयोग की नींव बनाया।
- 1562 ई. में आमेर के राजा भारमल की पुत्री हरकाबाई (मरियम-उज़-ज़मानी) से विवाह
- सलीम (जहाँगीर) का जन्म
- आमेर, बीकानेर, मारवाड़, जैसलमेर आदि से वैवाहिक गठजोड़
यह नीति मुगल–राजपूत संबंधों का टर्निंग पॉइंट सिद्ध हुई।
(ग) सैन्य एवं प्रशासनिक नीति
- राजपूत शासकों को मनसब प्रदान किए गए
- प्रशासन व युद्ध अभियानों में भागीदारी
- ‘वतन जागीर’ की व्यवस्था
- बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा की गारंटी
(घ) सुलह-ए-कुल की नीति
अकबर की नीति धार्मिक सहिष्णुता और सहयोग पर आधारित थी।
- जो शासक सहयोगी बने, उन्हें सम्मान
- विरोध करने वालों को शक्ति से पराजित किया गया (चित्तौड़, रणथम्भौर)
(ङ) टीका प्रथा
राजपूत उत्तराधिकार को मुगल सम्राट की स्वीकृति आवश्यक बना दिया गया।
इससे स्पष्ट हुआ कि सर्वोच्च संप्रभुता मुगल सम्राट में निहित है।
अजमेर सूबे का निर्माण और महत्व:Mughal policy towards the Rajputs
- राजस्थान को अजमेर सूबा बनाया गया
- राजधानी: अजमेर
- प्रमुख सरकारें: अजमेर, चित्तौड़, रणथम्भौर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर, सिरोही
- सभी कर अजमेर में जमा होते थे
- मुगल भू-राजस्व प्रणाली लागू
अजमेर मुगलों का प्रशासनिक और धार्मिक केन्द्र बना।
जहाँगीर की राजपूत नीति (1605–1627):Mughal policy towards the Rajputs
विशेषताएँ
- अकबर की नीति का अनुसरण
- लेकिन उत्तराधिकार में हस्तक्षेप बढ़ा
प्रमुख उदाहरण
- बीकानेर में दलपतसिंह बनाम सूरसिंह विवाद
- आमेर में भावसिंह को टीका
- किशनगढ़ और रतलाम जैसे नए राज्यों की स्थापना (राजपूत शक्ति संतुलन हेतु)
कर्नल टॉड का कथन:
“Mughal Emperor (मुगल बादशाह) अपनी विजयों में से आधी के लिए राठौड़ों की तलवारों के ऋणी थे।”
शाहजहाँ की राजपूत नीति (1628–1658):Mughal policy towards the Rajputs
विशेषताएँ
- सहयोग बना रहा
- लेकिन राजपूतों की स्वायत्तता में सूक्ष्म कटौती
प्रमुख घटनाएँ
- टीका की रस्म प्रधानमंत्री द्वारा
- शाहपुरा राज्य की स्थापना
- नागौर राज्य का निर्माण
- कोटा राज्य की स्थापना (1631 ई.) – बूंदी से पृथक
राजपूत राज्यों के विभाजन की नीति स्पष्ट दिखती है।
औरंगजेब की राजपूत नीति (1658–1707):Mughal policy towards the Rajputs:
विशेषताएँ
- इसे राजपूत–मुगल सहयोग का अवसान काल कहा जाता है
- धार्मिक कट्टरता
- उत्तराधिकार विवादों में खुला हस्तक्षेप
प्रमुख घटनाएँ
- बीकानेर में अनूपसिंह को गद्दी
- जोधपुर में अजीतसिंह के विरुद्ध नीति
- दुर्गादास राठौड़ का संघर्ष
- 30 वर्षीय मुगल–मारवाड़ युद्ध
विरोधाभास
हालाँकि औरंगजेब कट्टर सुन्नी था, फिर भी—
- हिन्दू मनसबदारों की संख्या 33% (सबसे अधिक)
- इनमें राजपूत और मराठा प्रमुख
6. तुलनात्मक निष्कर्ष (Comparative Conclusion)
| शासक | नीति का स्वरूप | परिणाम |
| अकबर | सहयोग, सुलह-ए-कुल | साम्राज्य की मजबूती |
| जहाँगीर | सहयोग + हस्तक्षेप | शक्ति संतुलन |
| शाहजहाँ | विभाजन की नीति | राजपूत शक्ति कमजोर |
| औरंगजेब | टकराव | मुगल शक्ति का पतन |
Mughal policy towards the Rajputs:निष्कर्ष
मुगलों की राजपूत नीति की सफलता का श्रेय अकबर की दूरदर्शिता को जाता है। जहाँ सहयोग बना रहा, वहाँ साम्राज्य मजबूत रहा; और जहाँ टकराव बढ़ा, वहीं मुगल सत्ता के पतन की नींव पड़ी।
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