Rajasthani Society and Culture:सामाजिक परिवर्तन व कुछ विशिष्ट जातियां
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राजस्थान का मध्यकालीन समाज: प्रमुख जातियाँ एवं सामाजिक संरचना(Rajasthani Society and Culture)
Rajasthani Society and Culture:राजस्थान की संस्कृति अपनी विविधता और विशिष्ट सामाजिक ढांचे के लिए विश्व प्रसिद्ध है। मध्यकाल में मुगल संपर्क और स्थानीय आवश्यकताओं के कारण यहाँ कई विशिष्ट जातियों का उदय और विकास हुआ। आइए, राजस्थान के सामाजिक ताने-बाने को समझने के लिए इन प्रमुख जातियों और उनके कार्यों पर एक नज़र डालते हैं:
कायस्थ (Rajasthani Society and Culture)
मध्यकालीन समाज के ढाँचे में मुगल सम्पर्क से नया मोड़ आया। फारसी जानने के कारण मुगल दरबार और राजस्थानी राज्यों के बीच होने वाले पत्र-व्यवहार में ‘कायस्थों’ की आवश्यकता महत्त्वपूर्ण समझी जाती थी।
बटनागर, पंचोली तथा माथुर संज्ञा के कायस्थ उस युग के कुशल प्रशासक और योद्धा थे। जिनमें रत्ना पंचोली, बच्छराज, हरराय, केसरीसिंह आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।
पुरातात्विक रूप से राजस्थान में कायस्थ जाति का पहला उल्लेख कसवा के 738 ई. के लेख में हुआ है। कायस्थ लोग अपनी उत्पत्ति ब्रह्मा के पुत्र चित्रगुप्त से मानते हैं।
चारण (Rajasthani Society and Culture)
ब्राह्मण और राजपूत जाति के गुणों का सामंजस्य हमें चारण जाति में मिलता है जिसका मध्ययुगीन सामाजिक व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। चारणों का मुख्य कार्य राजपूत वीरों की ख्याति का गुणगान करना, युद्ध के अवसर पर वीर रस के गीतों द्वारा सैनिकों को प्रोत्साहित करना था।
Rajasthani Society and Culture:हिन्दू जातियों के अतिरिक्त मुसलमानों का भी इस युग में एक स्वतंत्र स्थान रहा है। इस काल में धर्म-परिवर्तन के द्वरा भी कई जातियाँ इस्लाम धर्म की अनुयायी बनी। जिनमें मेवात के ‘मेव’, फतेहपुर और झुंझुनूं (शेखावटी) के मुस्लिम चैहान या ‘कायमखानी’ मुख्य हैं।
अनूपगढ़, पूँगल और मारोठ के मुसलमान आज भी ‘पीरदास’ कहलाते हैं। ‘पीर’ शब्द इस्लाम धर्म और दास हिन्दू धर्म का सूचक है। काजी, सैयद, कायमखानी अपने को अन्य मुसलमानों से उच्च मानते हैं।
मध्यकालीन युग में, विशेष रूप से मुगल सम्पर्क काल में शिल्पों की वृद्धि के साथ कई जातियों का बाहुल्य हो गया जिनमें ‘छीपे’, ‘शिकलीगर’, ‘पटवा’, ‘घांची’, ‘मोची’, ‘ठठेरा’, “, ‘सुनार’, ‘लुहार’ आदि थे।
इस युग में दासों के लिए दास, दासी, गोला, गोली, चाकर आदि शब्दों का उपयोग करते थे। विवाह के अवसर पर दास और दासियों को खंज में दिया जाता था और तब से उनका संबंध नये परिवार में हो जाता था। इस युग में विदेशों से आने वाली सभी बस्तियों को म्लेच्छ (अपवित्र) की संज्ञा दी गई।
भाट/जागा (Rajasthani Society and Culture)
भाट जाति का मुख्य कार्य राजवंशों, गांव के ठाकुरों तथा श्रेष्ठि परिवारों की वंशावलियां संग्रहीत करना तथा उन्हें बहियों के माध्यम से लिपिबद्ध करना रहा है। भाटों की बहियां राजस्थान के इतिहास की टूटी कडियों को बेड़ने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई है। प्रत्येक जाति का अपना भाट होता था।
भाटों की तरह ही प्रत्येक जाति का ‘जागा’ होता किए गए प्रमुख कायों का बखान करते थे तथा लिपिबद्ध करते थे। ‘जागा’ की बहियों के आधार पर उत्तराधिकारी का या और अभी भी होता है।
ये लोग बच्चों के जन्म, विवाह आदि उत्सवों पर परिवार की वंशावली तथा उनके पूर्वजों द्वारा निर्धारण भी होता था।
कालबेलिया (Rajasthani Society and Culture)
कालबेलिये नाथ मतावलम्बी एवं आदि शिव के उपासक होते हैं। चूंकि ‘शिव’ को ‘नाग’ प्रिय होते हैं, इसलिए कालबेलिये भी सांप की आराधना करते हैं।
इन्हें कालबेलिये (काल अर्थात् सांप, बेली अर्थात् मित्र) ‘सांपों का मित्र’ कहते हैं। आज भी ग्राम्यांचलों में इन्हीं कालबेलियों की मदद से लोग अपने घरों में घुसे हुए सांप को पकडवाते हैं।
घर के द्वार पर बजती हई बीन की धुन सुनते ही सांप बरबस खिंचे चले आते हैं। ये लोग भर्तृहरि-गाथा शिवजी का ब्यावला इत्यादि लोकाख्यानों को गाते हैं। लोकप्रिय ‘कालबेलिया’ नृत्य इन्हीं कालबेलियों की देन है।
जिसकी आज देश-विदेश में धूम मची हुई है। यह नृत्य कालबेलिया युवतियों के द्वारा किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष बीन की मनोहारी धुनें निकालते हैं तथा भपंग वादन करते हैं।
नृत्यांगना ‘गुलाबो’ का नाम उल्लेखनीय है जिसने अपनी कालबेलिया नृत्यकला की बदौलत कालबेलियों को विशिष्ट पहचान दी और राजस्थान का नाम विश्व भर में ऊंचा किया।
गुलाबो इस बेहतरीन नृत्यकला का प्रदर्शन अनेक देशों में कर चुकी है। सन् 2010 में यूनेस्को ने कालबेलिया नृत्य को विश्वदु सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया है।
Rajasthani Society and Culture:यूनेस्को की सालाना सूची में विश्व की श्रेष्ठ कलाओं को शामिल कर उनके कलाकारों को वैश्विक पहचान और मदद दिला कर कला को सहेजने की कोशिश की जाती है।
भोपा (Rajasthani Society and Culture)
‘पाबू प्रकाश’ के अनुसार भोपा जाति भीलों की वशंज है। भीलों से ‘नायक’ और ‘नायकों’ से भोपों को अलग हुआ बताया जाता है। ये आज भी राजस्थान में अपनी अलग-अलग वंश परंपरा बनाये हुए हैं।
भोपों की कई शाखाएं जैसे – गूजर भोपा, नायक भोपा, कामड़ भोपा और भील भोपा। सभी पारंपरिक लोकगायक होते हुए भी रोटी-बेटी के व्यवहार में सर्वथा भिन्न हैं।
संपूर्ण राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में भोपों को देखा जा सकता है। जोधपुर, नागौर, बीकानेर, चूरू, सीकर, झुंझुनूं और जयपुर से श्रीगंगानगर के बीच जो भोपा लोक गायक मिलते हैं, उनकी अलग पहचान है।
ये पाबूजी के भोपा होते हैं अर्थात् पाबूजी राठौड़ की कहानी को गाकर सुनाना और इसी आधार पर अपनी वंश परंपरा को कायम रखना इनकी विशेषता है।
एक जगह से दूसरी जगह घूमते-फिरते रहने वाली यह जाति गांव या बस्ती से बाहर खुले में अपना डेरा लगाती है। आमतौर पर दो-चार डेरे यानि परिवार एक साथ रहते हैं।
डेरा लगाने का भी एक खास तरीका होता है। ये लोग अपने तम्बू या ‘सरकी’ को अर्द्धगोलाकर आकृति में बनाते हैं, ताकि बरसात और आंधी तूफान से बचाव हो सके।
इसी कारण इनको ‘सरकी बंद’ कहा जाता है।
पाबूजी भोपाओं के आराध्य देव हैं। शक्ति रूपा मातेश्वरी और भैरवदेव की भी पूजा करते हैं। भोपा हिंदू होते हैं तथा केवल हिंदुओं के ही त्यौहार मनाते हैं।
झगड़े फसाद की स्थिति में भी मामला भोपा बिरादरी द्वारा सुलझाया जात है। इसके लिये पंचायत बिठायी जाती है। ‘लाग’ और ‘ढो’ अर्थात् दोनों पक्षों को एक जगह बिठाया जाता है। ‘मुचलके’ भरवाये जाते है।
यह ‘मुचलका’ नगद या पेशगी होती है। मुचलका भर देने के बाद दोनों पक्षों पर पाबंदी लग जाती है। ऐसी स्थिति में तेज आवाज में बोलना मात्र भी पंचायत का अपमान माना जाता है।
पंचायत कई दिनों तक चल सकती है। तब तक पंचगणों और मुखियाओं का खाने-पीने का पूरा खर्चा विवाद वाले दोनों पक्षों को भुगतना पड़ता है।
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कठपुतली नट (Rajasthani Society and Culture)
कठपुतली नट, कठपुतलियों के माध्यम से नाट्यकला का प्रदर्शन करते हैं। किसी समय राजस्थान में कठपुतली नटों की संख्या काफी थी किंतु अब ये कम संख्या में रह गये हैं।
विक्रमादित्य के समय ‘सिंहासन बत्तीसी’ नामक एक सिंहासन था जिसकी 32 पुतलियां रात को अपने राग रंग से सम्राट को रिझाती थी।
पिरचेल जैसे विद्वान का कहना है कि विश्व की समस्त पुतलियों का उद्गम स्थल भारत है। भारत में कठपुतली कला की सात शैलियां हैं, इनमें से राजस्थान की सूत्र संचालित पुतलियां, दक्षिण भारत की बम्बोलोटम पुतलियां, आंध्र की छाया एवं काष्ठ पुतलियां, बंगाल की छड़ आदि पुतलियां प्रमुख हैं।
राजस्थान की कठपुतलियां भाटों तथा नटों द्वारा नचाई जाती हैं। ये नट पहले राजा-महाराजाओं के दरबार की शोभा बढ़ाते थे । धीरे-धीरे इनका सामाजिक और आर्थिक स्तर गिरता चला गया।
धावड़िया/धाड़ाती (Rajasthani Society and Culture)
डाका डालने वालों को धावड़िया कहते थे। ये मुख्य रूप से गुर्जर, मीणा, जाट और राजपूत होते थे। धाड़ाती धाड़ा डालने से पहले उस व्यक्ति को सूचना भिजवाते थे तथा उसके मकान के आगे सूचना चस्पा कर देते थे और निश्चित तारीख को ही वे डाका डाला करते थे।
डूंगजी, जवाहरजी, करमामीणा आदि प्रसिद्ध धावड़िया हुए हैं। राजस्थान में इस व्यवस्था को सीमित करने का श्रेय मोहनलाल सुखाड़िया को है।
नौची (Rajasthani Society and Culture)
भारतीय समाज में घरेलू और सार्वजनिक उत्सवों पर नृत्य करने एवं गानेवालियों (गौनहारियों) का एक अलग वर्ग था। उत्तर भारत में इनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी, कोई भी शुभकार्य इनके बिना अधूरा माना जाता था, राजस्थान में इन्हें रामजनी, भगतण और उर्दू में तवायफ कहते थे।
18वीं शती के अंत और 20वीं शती में जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज अफसरों को भी सामाजिक उत्सवों पर नाचने वालियों की आवश्यकता पड़ी तो इसी वर्ग के लोगों को बुलाने लगे।
वे लोग इन्हें नौच गर्ल्स कहते थे, इसी नौच गर्ल्स का हिन्दी रूप नौची हो गयी। ये स्वतंत्र थी, अपने नृत्य संगीत का व्यवसाय करती थी। इनके अलग-अलग समूह थे, समूह का प्रधान एक बुजुर्ग महिला होती थी जो नायिका कहलाती थी। वह अपने घर व व्यवसाय का प्रबंध संभालती थी।
राजस्थान की हस्तशिल्प जातियां (Rajasthani Society and Culture)
राजस्थान की हस्तशिल्प जातियों में पिंजारा, बुनकर, नीलगर, सुनार, बरकसाज, ठठेरे, सिकलीगर, लुहार, मणिहारे, लखारे, बढ़ई, गाँछी, बोला, सिलावट, पटवे आदि सम्मिलित किये जाते हैं।
इनका विशद् वर्णन ‘राजस्थान की हस्तशिल्प जातियां एवं हस्तशिल्प’ अध्याय में किया गया है।
पशुपालक जातियां
गौपालक (Rajasthani Society and Culture)
गायों के पालनार्थ गुजरों द्वारा बसाये गए गाँव गोठ (सं. गोष्ठ) के नाम से प्रसिद्ध हैं। पशुओं को बराने का काम करने वाले व्यक्ति गवालिया, ग्वालिया (सं. गोपालक) या ‘घेरवालया’ कहलाता है।
बछडों को चराने वाले गोप के लिए प्राकृत ‘वच्छवाली’ देश्य-वच्छीवो शब्द आये हैं। गायों को पालने वाली जाति ‘गुजर’ (सं. गुर्जर) कहलाती है।
पशुओं के धणों (सं. स्तन) से दूध दोहने की क्रिया के लिए दुबारी शब्द प्रचलित है। दुबारी करने वाला ‘दुवाड्या’ कहलाता है।
भेड़ पालक (Rajasthani Society and Culture)
भेड़ों को पालने वाला गायरी या गाडरी (सं. गड्डरिक) कहलाता है। राजस्थानी के एवाल या एवाल्यो शब्द, जो गायरी के ही सूचक सूचक है, भी ‘अविपाल मविपाल या अजापाल’ से व्युत्पन्न हैं।
पश्चिमी राजस्थान में भेड़पालक या अविपाल को ‘गायरी’ कहते हैं। भेड-बकरियों को चराने वाले एवालिया, गवालिया या गायरी कहलाते हैं।
घोड़ा पालक (Rajasthani Society and Culture)
मारवाड़ में बेलर, सिन्धी, देशी, मारवाड़ी, काठियावाड़ी, ताजी, तुर्की, अरबी, मालानी और पहाड़ी बाति के घोड़े पाये जाते हैं। इनमें मालानी अपनी उत्तमता के लिए जाने जाते हैं। हैं।
घोड़े की की सेवा टहल करने वाला व्यक्ति बारवादार कहलाता है। घोड़ों को बाँधने का स्थान तबेलों (फा. अस्तबल), पायगा (फा. पायगाह) या ‘ठाण’ (सं. स्थान) कहलाता है।
घोड़ों को प्रशिक्षित करने वाले ‘फेरण्यां’ (सं. प्रेरणक) कहलाते हैं और घोड़ों के लक्षण जानने वाले ‘सलालोतरी’ (सं. शालिहोत्री) कहलाते हैं। उत्तर पश्चिमी एवं दक्षिणी पूर्वी राजस्थान में मुख्यतः गुर्जर जाति ही घोड़ा पालन करती है।
ऊँट पालक (Rajasthani Society and Culture)
ऊँटों को प्रशिक्षण देने वाले व्यक्ति फेरा या फेरण्या कहलाते हैं। ऊँटों के साथ सुरक्षा की दृष्टि से चलने वाले व्यक्ति के लिए बोलाई शब्द प्रचलित है। ऊँटों की देखभाल और परिचर्या करने वाले व्यक्ति मारवाड़ में ‘राइका’ और मेवाड़ में ‘रेबारी’ कहलाते हैं।
Rajasthani Society and Culture:राइका के लिए राइ, राइजी आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है। रेगिस्तान में ऊँटों की चलने वाली पंक्ति कतार और इनके साथ चलने वाले कतारिया कहलाते हैं। ऊँट के सवार को सॉंडणी सवार, शुतर सवार (फा. शुत्र असवार), या ओठी (सं. ओष्ट्रिक) कहते हैं।
ऊँटों की धीमी चाल वीखां कहलाती है। अधिक तेज चाल पड़छ या सूंड कहलाती है। रैवारियों के दो भेद है- (1) मारु और (2) चालकिया। मारु रैबारी केवल ऊँट पालते है जबकि चालकिया ऊँट के साथ-साथ भेड़-बकरियां भी पालते हैं।
अहीर
ये लोग गाय, भैंस आदि पशु पालते हैं, चराते हैं। ये परम्परागत पशुपालक लोग है। तथा दूध, घी, मठ्ठा आदि बेचते हैं।
कृषक जातियां(Rajasthani Society and Culture)
कलबी
इनका प्रधान व्यवसाय कृषि है। इन्हें मारवाड़ में पटेल नाम से भी पुकारा जाता है। इनकी अधिक आबादी बाड़मेर तथा जालौर जिलों में है। ये लोग गुजरात से राजस्थान में आए तथा पचपदरा, सिवाना और जालौर में बस गए।
लोधा
ये अधिकतर हाड़ौती क्षेत्र, भरतपुर व सवाई माधोपुर जिले में बसे हैं। इनका मुख्य पेशा कृषि है।
धाकड़
ये लोग काश्तकारी में बड़े कुशल होते हैं। धाकड़ लोगों का भी मुख्य पेशा कृषि है। कुछ लोग इन्हें कृष्ण का वंशज मानते हैं परन्तु कुछ विद्वान इन्हे जगदेश पंवार का वंशज मानते हैं।
कीर
ये लोग चावल, सिंघाड़ा, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज आदि पैदा करते हैं।
कीर जाति का मुख्य व्यवसाय नदियों व तालाबों में फसल पैदा करना है।
सेवक जातियाँ (Rajasthani Society and Culture)
कलाल
कलाल जाति का प्रमुख व्यवसाय शराब बेचना है। पहले यही लोग शराब बनाते थे। यह जाति तीन भागों में विभाजित है- (1) सूंगा, (2) टाक, (3) मेवाड़।
कहार
ये लोग पालकी उठाने का कार्य करते हैं। ये पानी भरते हैं तथा रसोई करते हैं।
बारीदार
इनका प्रमुख व्यवसाय पत्तियों की सीकों को गांठ कर दोने-पत्तल बनाना है। ये राजाओं के जूठे पत्तल भी उठाते थे। ये अपने आपको रावत कहते हैं।
बेलदार
इनका मुख्य काम भूमि की खुदाई करना है। ये तालाब खोदते हैं तथा खानें खोदकर पत्थर निकालते हैं। मुसलमानों की कब्रें भी यही खोदते हैं।
बालदिया
ये बंजारा भी कहलाते हैं। ये बैलों पर बालद लादते हैं। इनका कोई घर नहीं होता, ये चलते-फिरते रहते हैं।
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