REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN: राजस्थान में 1857 की क्रांति
REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN: राजस्थान के राज्यों ने अंग्रेज कंपनी के साथ संधियाँ (1818 ई.) करके मराठों द्वारा उत्पन्न अराजकता से मुक्ति प्राप्त कर ली तथा राज्य की बाहा सुरक्षा के बारे में भी निश्चित हो गए, क्योंकि अब कम्पनी ने उनके राज्य की बाहरी आक्रमणों में सुरक्षा की जिम्मेदारी भी ले ली थी।
परन्तु संधियों में उल्लेखित शतों को कम्पनी के अधिकारियों ने जैसे ही क्रियान्वित करना शुरू किया तो कम्पनी ने राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करके देशी नरेशों की प्रभुसता पर भी चोट की एवं उनकी स्थिति कम्पनी के सामन्तों व जागीरदारों जैसी हो गई।
कम्पनी की नीतियों से सामन्तों की पद मर्यादा व अधिकारों को भी आघात लगा। कम्पनी द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप राजा, सामंत, किसान, व्यापारी, शिल्पी एवं मजदूर सभी वर्ग पीड़ित हुए।
राजस्थान में ब्रिटिश आधिपत्य के परिणामस्वरूप शासकों की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो गयी, राज्य की आर्थिक दशा बदतर हो गयी, प्रशासन में भ्रष्टाचार, शासकों के भोग-विलास में वृद्धि, सामन्तों की पद मर्यादा को श्रीण करने का प्रयास, लोगों पर पाश्चात्य विचार एवं संस्थाएं थोपने तथा उनके परम्परागत रीति-रिवाजों को समाप्त करने, ईसाई धर्म प्रचार नीति एवं उनके सामाजिक सुधारों आदि को जनता ने अपने धर्म व जीवन में घोर हस्तक्षेप माना।
इस प्रकार सम्पूर्ण राजस्थान में और सभी वर्गों में ब्रिटिश विरोधी भावना व्याप्त थी, इसलिए यहाँ भी विद्रोह का शुभारंभ हुआ।
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राजस्थान में 1857 के विद्रोह (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN) के समय 6 ब्रिटिश छावनियां थी जो इस प्रकार थी-
1. बंगाल नेटिव इन्फेंट्री-नसीराचाद,
2. मेरवाड़ा बटालियन-ब्यावर,
3. कोटा कन्टिलजेन्ट-देवली,
4. मेवाड़ भीलकोर खखैरवाड़ा,
5. जोधपुर लीजियन-एरिनपुरा और
6. नीमच छावनी नीमच।
राजस्थान में 1857 के विद्रोह (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN) के समय राजस्थान में 4 पॉलिटिकल एजेंट थे-
1.मॉकमैसन-मारवाड़,
2.मंजर शावर्स-मेवाड़,
3.कर्नल ईडन-जयपुर,
4.मेजर बर्टन कोटा।
राजस्थान का ए.जी.जी. पेट्रिक लारेन्स था एवं भारत का गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग था।
राजस्थान में 1857 के विद्रोह की शुरुआत एवं प्रसार (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN)
1757 ई. में प्लासी की लड़ाई और 1857 के विद्रोह के बीच ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने एक सौ वर्ष पूरे कर लिए थे।
भारत में ब्रिटिश शासन के प्रथम सौ वर्षों में कई बार ब्रिटिश सत्ता को भारतीयों से चुनौती मिली जिसमें अनेक असैनिक, स्थानीय बगावतें शामिल थी।
इस समय के अधिकांश आंदोलन ब्रिटिश शासन के प्रति व्यापक असंतोष तथा व्यक्तिगत शिकायतों के कारण हुए। भारत में अंग्रेजी नीति के विरुद्ध पनप रहे असंतोष का शासक वर्ग को पूर्वाभास हो चुका चुका था।
इसलिए तत्कालीन भारतीय गवर्नर जनरल ‘लार्ड कैनिंग’ ने यह आशंका व्यक्त की थी कि ‘हमें यह कदाचित नहीं भूलना चाहिए कि भारत के इस शांत आकाश में कभी भी एक छोटी सी बदली उत्पन्न हो सकती है जिसका आकार पहले तो मनुष्य की हथेली से बड़ा नहीं होगा, किन्तु जो उत्तरोत्तर विराट रूप धारण करके अंत में वृष्टिविस्फोट के द्वारा हमारी बर्बादी का कारण बन सकती है।‘
भारतीय स्वतंत्रता हेतु प्रथम सशस्त्र विद्रोह 10 मई, 1857 को मेरठ स्थित छावनी की 20 एन.आई.एस. तथा तीन
एल.सी. की पैदल टुकड़ी ने चर्बी वाले कारतूस के प्रयोग से इंकार कर विद्रोह की शुरुआत की। इस सैनिक विद्रोह का नेता बख्तखान था।
11 मई, 1857 को मेरठ के विद्रोहियों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय (जफर) को पुनः भारत का सम्राट और विद्रोह का नेता घोषित कर दिया।
तत्पश्चात विद्रोह देश के विभिन्न भागों में तेजी से फैला।
अन्य भागों की तरह राजस्थान में भी विद्रोह की ज्वाला भड़की। क्रान्ति के प्रतीक के रूप में ‘कमल’ और ‘रोटी’ को चुना गया।
कमल के फूल को उन सभी सैन्य टुकड़ियों को भेजा गया जो विद्रोह में शामिल थी तथा रोटी को एक गाँव का चौकीदार दूसरे गाँव तक पहुँचाता था।
राजस्थान में क्रांति के प्रमुख केन्द्र (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN)
नसीराबाद का विद्रोह (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN)
राजस्थान में क्रांति का आरम्भ नसीराबाद से हुआ। नसीराबाद में 15वीं और 30वीं बंगाल
नेटिव इन्फेन्ट्री भारतीय तोपखाने की टुकड़ी तथा फर्स्ट बम्बई लांसर्स के सैनिक विद्यमान थे।
28 मई 1857 को 15वीं इन्फेन्ट्री के सैनिकों ने दिन के 3 बजे विद्रोह की शुरुआत कर तोपखाने पर अधिकार कर लिया।
अंग्रेज मेजर प्रिचार्ड ने नसीराबाद छावनी में मौजूद सिपाहियों को बागियों के विरुद्ध कार्यवाही करने का आदेश दिया किंतु सैनिकों ने यह आदेश मानने से इन्कार कर दिया।
केवल बम्बई लांसर्स अंग्रेजों की वफादार रही। मेजर स्पोटिसबुड तोपखाने की ओर आगे बढ़ा किंतु वह गोली लगने से वहीं गिर गया तथा उसकी मृत्यु हो गयी।
‘कर्नल न्यबरी’ के टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। लेफ्टीनेंट लॉक व कप्तान हार्डी बुरी तरह से घायल हो गये। धीरे-धीरे सभी सैनिक विद्रोही हो गये।
मेरवाड़ा लांसर्स ने ब्रिटिश अधिकारियों एवं उनके परिवारों की रक्षा की। नसीराबाद छावनी तथा बाजार को लूटने के बाद नसीराबाद के विद्रोही सैनिक दिल्ली के लिये कूच कर गये।
18 जून 1857 को ये सैनिक दिल्ली पहुँचे तथा उन्होंने उस अंग्रेज पलटन पर पीछे से आक्रमण किया जो दिल्ली का घेरा डाले हुए थी।
इस युद्ध में अंग्रेज सेना हार गयी। दिल्ली में बहादुरशाह जफर को हिन्दुस्तान का बादशाह बनाया गया तथा उसने विद्रोही सैनिकों के नाम फरमान जारी किये।
जोधपुर नरेश ने अंग्रेज अधिकारियों को जोधपुर आने का निमंत्रण दिया। इस पर अंग्रेज अधिकारी अपने परिवारों के साथ जोधपुर आ गये। ‘कर्नल पेन्नी’ का मार्ग में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।
नीमच विद्रोह (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN)
नसीराबाद के बाद क्रान्ति की अग्नि नीमच में भी प्रज्ज्वलित हुई। 2 जून को कर्नल अबोट ने हिन्दू और मुसलमान सिपाहियों को गंगा और कुरान की शपथ दिलाई थी वे ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार रहेंगे, कर्नल अबोट ने स्वयं ने भी बाइबिल को हाथ में लेकर शपथ ली थी,
जिससे कि वह अपने अधीन सिपाहियों का पूर्ण क्रांति प्राप्त कर सके परन्तु 3 जून 1857 को रात्रि 11 बजे भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया।
उन्होंने तोपखाने पर अधिकार करके छावनी को घेर लिया तथा उसमें आग लगा दी। इसी समय खबर आयी कि मेवाड़ पॉलिटिकल एजेंट कप्तान शावर्स बेदला के राव बख्तसिंह के नेतृत्व में सेना लेकर नीमच आ रहा है।
इस पर विद्रोही सिपाहियों ने लूट का माल लेकर बैण्ड बजाते हुए छावनी से कूच किया। इन सिपाहियों ने देवली पहुँच कर वहाँ भी छावनी को लूटा।
यहाँ से विद्रोही सिपाही टोंक तथा कोटा होते हुए दिल्ली पहुँचे और दिल्ली के क्रांतिकारियों से मिलकर अंग्रेज सेना पर आक्रमण किया।
शावर्स की सहायता के लिए मेवाड़ का ए.जी.जी. जार्ज लॉरेन्स भी आ गया किंतु तब तक क्रांतिकारी दिल्ली के लिये कूच कर चुके थे।
नीमच के लगभग 40 अंग्रेज, जिनमें औरतें व बच्चे भी सम्मिलित थे, इधर-उधर जंगल में भटकते, भूखे-प्यास और भयभीत एवं आतंकित हुए डूंगला गांव में पहुंचे जहां रूगाराम नामक एक किसान ने उन्हें शरण दी थी।
आतंककारी भी उनका पीछा करते हुए वहां पहुंचे, परन्तु इस बीच पॉलिटिकल एजेन्ट शावर्स मेवाड़ी सेना के साथ डूंगला पहुंच गया।
उसने इन अंग्रेज औरतों व बच्चों को सुरक्षित उदयपुर पहुंचा दिया। महाराणा ने उन्हें पिछोला झील में बने जगमंदिर में ठहराया और राज्य की ओर से उनकी सुरक्षा का कड़ा प्रबंध किया गया।
द्वितीय केवेलरी के कमांडर कर्नल जेक्सन ने 12 अगस्त, 1857 को नीमच में इस सूचना के आधार पर कि भारतीय सेना में विद्रोह होने वाला है और उनकी योजना समस्त यूरोपीय अधिकारियों की हत्या कर देने की है, यूरोपीय सैनिकों को बुला भेजा।
इस घटना ने नीमच स्थित भारतीय सैनिकों को उत्तेजित कर दिया। उत्तेजना में एक यूरोपीय सिपाही की हत्या कर दी गई।
ब्लियेयर किसी यूरोपीय की बन्दूक से ही घायल हो गए। सैनिकों ने कर्नल जेक्सन के आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया।
यहां तक कि यूरोपीय अधिकारियों के मध्य भी आदेश दिए जाने संबंधी वाद-विवाद उठ खड़े हुए, अतः यह निश्चिय किया गया कि नीमच के क्रांतिकारियों को दबाने के लिए और अधिक सैनिक बुलाए जाए।
परन्तु इसी बीच उदयपुर की सहायता से क्रांति को दबा दिया गया।
आउवा का विद्रोह (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN)
एरिनपुरा स्थित अंग्रेज छावनी में जोधपुर-लीजन का सदर मुकाम था। लीजन में 600 घुड़सवार और 1400 पैदल सैनिक थे।
इस लीजन के 90 सैनिक अभ्यास हेतु माउण्ट आबू गये हुए थे। माउण्ट आबू ए.जी.जी. का ग्रीष्मकालीन मुकाम था।
23 अगस्त, 1857 को जोधपुर-लीजन ने दफेदार मोती खाँ और सूबेदार शीतल प्रसाद एवं तिलकराम के नेतृत्व में विद्रोह का बिगुल बजा दिया।
वे क्रान्ति के नेताओं के आदेशानुसार ‘चलो दिल्ली मारो फिरंगी’ के नारे लगाते हुये दिल्ली की ओर चल पड़े। राह में उनका मुकाम आउवा में हुआ। वहाँ के ठाकुर कुशालसिंह चाम्पावत ने क्रान्तिकारी सेना का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया।
आसोप, आलनियावास, गूलर, लाम्बिया, बन्तावास और रूदावास के जागीरदार भी अपनी-अपनी सेना के साथ क्रान्तिकारियों से आ मिले। ठा. कुशालसिंह के मेवाड़ के सलूम्बर और कोठारिया आदि जागीरदारों को भी क्रांति में शामिल होने का आह्वान किया।
इन जागीरदारों की क्रांतिकारियों के साथ सहानुभूति थी, पर यह सहानुभूति सक्रिय सहयोग में नहीं बदल सकी। हो सकता है इन जागीरदारों ने क्रांतिकारियों की रसद व नकद से थोड़ी बहुत सहायता की हो। जो हो क्रांतिकारी सेना की संख्या छः हजार तक पहुँच गयी।
राजपूताना के ए.जी.जी. लॉरेंस को जब आउवा में क्रांतिकारी सैनिकों के जमाव का पता चला तो उसने जोधपुर के
महाराजा तख्तसिंह को क्रान्तिकारियों को कुचलने के लिये लिखा।
जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह ने अपने किलेदार ओनाड़सिंह पंवार और फौजदार राजमल लोदी के नेतृत्व में 10 हजार सैनिक एवं घुड़सवार तथा 12 तोपें आउवा रवाना की।
इस फौज के साथ लेफ्टिनेंट हीथकोट भी सम्मिलित या 8 सितम्बर 1857 को आउवा के निकट बिथोड़ा (पाली) नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में कड़ा मुकाबला हुआ। राज्य सेना ने भारी शिकस्त खाई।
ये समाचार जब लॉरेंस को मिले तो वह अजमेर से सेना लेकर आउवा के लिए रवाना हुआ। जोधपुर का पॉलिटिकल एजेंट मैसन भी सेना के साथ था।
18 सितम्बर 1857 को चेलावास जामक स्थान पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। क्रांतिकारी फिर विजयी हुये। युद्ध के दौरान मैसन मारा गया। क्रांतिकारियों ने उसका सिर धड़ से अलग कर आउवा में घुमाया और बाद में उसे किले के दरवाजे पर टांग दिया। लॉरेंस ने भाग कर अजमेर की राह ली।
क्रांतिकारियों ने रिसालदार अब्दुल अली, अन्वास अली खां, शेख मोहम्मद बख्श और हिन्दू और मुसलमान सिपाहों के नाम पर मारवाड़ और मेवाड़ की जनता से अपील की कि वह उन्हें हर संभव सहायता प्रदान करे।
ठाकुर खुशालसिंह ने भी मेवाड़ के प्रमुख जागीरदार ठाकुर संमंदसिंह से ब्रिटेन के विरुद्ध सहायता देने का प्रस्ताव किया, ठाकुर समंदसिंह ने और मारवाड़ के अनेक प्रमुख जागीरदारों ने चार हजार सैनिकों की सहायता का आश्वासन दिया।
आसोप के ठाकुर श्योनाथसिंह, पुलनियावास के ठाकुर अजीतसिंह, बोगावा के ठाकुर जोधसिंह, बांता के ठाकुर पेमसिंह, बसवाना के ठाकुर चांदसिंह, तुलगिरी के ठाकुर जगतसिंह ने 9 अक्टूबर, 1857 को दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। दिल्ली सम्राट से सहायता लेने के लिए।
क्रांतिकारी आसोप ठाकुर शिवनाथसिंह के नेतृत्व में दिल्ली रवाना हुये। नारनोल पर अंग्रेजी सेना ने उन्हें करारी मात दी।
ठाकुर शिवनाथसिंह मारवाड़ लोट गये। उन्होंने अंग्रेजों के सम्मुख आत्म-सम्र्पण कर दिया। उनकी जागीर जब्त करली गयी।
गूलर और आलनियावास के ठाकुर शेखावाटी में लूटमार करते रहे। उन्हें अपनी जागीरों से अपदस्थ कर दिया गया।
इधर चेलावास के युद्ध में लॉरेंस की हार के समाचार गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को मिले तो उसने पालनपुर और – नसीराबाद से एक बड़ी सेना ‘कर्नल होम्स‘ के नेतृत्व में आउवा भेजी।
क्रांतिकारी जीत की कोई आशा न देख आउवा से – रवाना हो गये। क्रांतिकारियों के नेता ठाकुर कुशालसिंह मारवाड़ में लूटमार करते हुए मेवाड़ चले गये।
उन्होंने कोटारिया के – रावत जोधसिंह के यहाँ शरण ली। अन्त में 8 अगस्त, 1860 को उन्होंने नीमच में अंग्रेजों के सम्मुख आत्मसमर्पण कर – दिया।
मेजर टेलर की अध्यक्षता में एक कमीशन ने उनके खिलाफ जांच की। उन्हें 10 नवम्बर, 1860 को रिहा कर दिया गया पर महाराजा जोधपुर ने उनकी जागीर का एक बड़ा भाग जब्त कर लिया ।
कोटा में विद्रोह (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN)
राजस्थान में सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कोटा का योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था। कोटा में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष राजकीय सेना तथा आमजन ने किया।
कोटा के पॉलिटिकल एजेन्ट मि. बर्टन थे।
कोटा में जयदयाल एवं मेहराबखान लोगों में क्रांति की भावनाएं भर रहे थे। उन्होंने 15 अक्टूबर, 1857 को क्रांति का बिगुल बजा दिया एवं रेजीडेन्सी को घेर लिया।
एक डॉक्टर सैडलर काटम व पॉलिटिकल एजेन्ट मि. बर्टन, उसके दो पुत्रों की हत्या कर दी गई। क्रांतिकारियों ने बर्टन का सिर धड़ से अलग कर दिया व इसका पूरे शहर में खुला प्रदर्शन किया।
कोटा के महाराव रामसिंह को उनके महल में नजरबन्द किया एवं कोटा राज्य की तोपों को अपने कब्जे में ले लिया। मार्च, 1858 में मेजर जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने कोटा की सेना पर आक्रमण किया।
30 मार्च, 1858 को कोटा पर अंग्रेजी सेना का अधिकार हो गया। मेहराब खाँ और जयदयाल को फाँसी दे दी गई।
करौली के महारावल मदनपाल की सेना भी मेजर जनरल रॉबर्ट्स के साथ थी। 6 महीने तक क्रांतिकारियों के अधीन रहने के बाद कोटा पुनः महाराव को प्राप्त हुआ। इस प्रकार कोटा में सर्वाधिक भीषण और व्यापक विप्लव हुआ।
धौलपुर में क्रांति (REVOLUTION OF 1857 IN RAJASTHAN)
धौलपुर के गूजर नेता देवा ने लगभग 3000 अपनी जाति के लोग एकत्र कर लिये थे। 9 जुलाई, 1857 को उन्होंने इरादत नगर की तहसील व राज्य खजाने से दो लाख रुपये लूटे।
अक्टूबर, 1857 में ग्वालियर और इन्दौर के विप्लवकारियों ने मिलकर धौलपुर राज्य की सीमा में प्रवेश किया। धौलपुर राज्य में विप्लवकारियों ने भीषण-लूट-खसोट की।
धौलपुर नरेश भगवतसिंह विद्रोही सैनिकों द्वारा घेर लिया गया और उसे मार डालने की धमकी दी गई। उसे भारी दबाव के कारण विप्लवकारियों की मांग स्वीकार करनी पड़ी।
राव रामचन्द्र और हीरालाल के नेतृत्व में लगभग 1000 विप्लवकारी आगरा की तरफ पलायन कर गये। आगरा पर आक्रमण करते समय विद्रोहियों ने धौलपुर राज्य की तोपों का ही प्रयोग किया था।
धौलपुर का शसक दिसम्बर, 1857 तक पूर्णतया शक्तिहीन बना रहा। अन्त में पटियाला नरेश ने धौलपुर शासक के प्रार्थना-पत्र पर 2000 सिक्ख सैनिक धौलपुर भेज।
उन्होंने धौलपुर नरेश को विप्लवकारियों से मुक्ति दिखाई और राज्य में पुनः व्यवस्था स्थापित की जा सकी।
ताँत्या टोपे का आगमन
ताँत्या टोपे पेशवा बाजीराव के उत्तराधिकारी नाना साहब का स्वामिभक्त सेवक था। 1857 की क्रांतिया टोपे का आगमनदोही नेता थे।
ताँत्या टोपे सर्वप्रथम 8 अगस्त, 1857 को भीलवाड़ा आये। वहाँ पर 9 अगस्त को उनका कुआड़ा गमिका स्थान पर जनरल रॉबर्ट्स की सेना से युद्ध हुआ, किंतु उन्हें पीछे हटना पड़ा। ताँत्या दिसम्बर, 1857 में पुनः मेवाड़ आये तथा 11 दिसम्बर, 1857 में उनकी सेना ने बाँसवाड़ा को जीता।
वहाँ से वे प्रतापगढ़ पहुंचे जहाँ मेजर रॉक की सेना ने उन्हें परास्त किया। इसके पश्चात् जनवरी, 1858 में टोंक पहुंचे।
टोंक में मेजर ईडन विशाल सेना के साथ आया, क्रांतिकारी टोंक छोड़कर नाथद्वारा चले गए। ताँत्या टोपे को नरवर के जागीरदार मानसिंह नरूका की सहायता से नरवर के जंगलों में पकड़ लिया गया और अन्ततः 7 अप्रैल, 1859 को उन्हें सिप्री में फाँसी दे दी गई।
वह राजस्थान के ब्रिटिश विरोधी लांगों से सहयोग प्राप्त करने की आंकाक्षा से राजस्थान आये थे लेकिन यहाँ उन्हें वांछित सहायता नहीं मिली अन्यथा वह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण साबित होता।
सितम्बर, 1857 को मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को कैद कर लिया गया और दिल्ली के लाल किले पर अंग्रेजी आधिपत्य हो गया। इस प्रकार देश को गुलामी से मुक्त कराने का प्रथम प्रयास विफल रहा।
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विद्रोह की असफलता के कारण
1.राजा-महाराजाओं का अंग्रेजों को भरपूर सहयोग देना बीकानेर का महाराजा सरदारसिंह गदर में अंग्रेजों को सहायता
देने में अग्रणी था।
वह राज्य की सेना के 5000 घुड़सवार और पैदल सैनिक लेकर पंजाब के हाँसी, सिरसा और हिसार जिलों में पहुँच गया।
राजस्थान के राजाओं में बीकानेर ही अकेला राज्य था जहाँ का शासक स्वयं अपनी सेना के साथ अंग्रेजों की सहायतार्थ राज्य के बाहर गया।
जयपुर के महाराजा रामसिंह ने गदर के दौरान अंग्रेजों की तन, मन और धन से सहायता की जिसक फलस्वरूप गदर के अन्त में अंग्रेज सरकार ने जयपुर को कोटपुतली का परगना स्थायी रूप से दे दिया।
अलवर के महाराजा बन्नेसिंह ने आगरा के किले में घिरे हुए अंग्रेजों की स्त्रियों व बच्चों की सहायता के लिए अपनी सेना और तोपखाना भेजा।
धौलपुर का महाराजराणा भगवन्तसिंह अंग्रेजों का वफादार था। अक्टूबर, 1857 में ग्वालियर और इन्दौर से लगभग 5000 विद्रोही सैनिक धौलपुर राज्य में घुस गये।
विद्रोहियों ने दो महीनों तक राज्य पर अपना अधिकार बनाये रखा। दिसम्बर में पटियाला की सेना ने धौलपुर पहुँचकर विद्रोहियों का सफाया किया।
करौली के महाराव मदनपाल ने गदर के दौरान कोटा के महाराव को विद्रोहियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिये अपनी सेना भेजकर ब्रिटिश सरकार की खैरख्वाही का परिचय दिया। इसके उपलक्ष में करौली जैसी छोटी-सी रियासत के राजा को अंग्रेजों ने 17 तोपों की सलामी और जी.सी.आई. की उपाधि से विभूषित किया।
राजस्थान के अन्य राज्य जैसलमेर, सिरोही, बूँदी, जयपुर, शाहपुरा और डूंगरपुर के शासक भी गदर में अंग्रेजों के वफादार रहे। लार्ड कैनिंग ने विद्रोह में राजाओं के सहयोग के बारे में कहा ‘इन्होंने तूफान में तरंग अवरोध(Wave Obstruction) का कार्य किया, नहीं तो हमारी किश्ती बह जाती।
2. विद्रोह के बारे में जॉन लारेन्स ने कहा कि,, ‘यदि विद्रोहियों में एक भी योग्य नेता होता तो,, हम सदा के लिए हार जाते’। अर्थात् विद्रोह में एक भी योग्य नेता नहीं था जो इसका सफलतापूर्वक संचालन कर सकता था।
3. क्रांतिकारियों में रणनीति व कूटनीति में दक्ष सेनानायकों का अभाव था।
4. क्रांतिकारियों के पास धन, रसद व हथियारों की कमी थी।
5. क्रांति के प्रमुख केन्द्र कुछ ही थे जैसे नसीराबाद, नीमच, कोटा, एरिनपुरा, जोधपुर, धौलपुर आदि। इसके अलावा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह था कि इन केन्द्रों पर क्रांतिकारियों के मध्य समय अंतराल अधिक था व इनमें आवश्यक समन्वय का अभाव था. जो क्रांति को दबाने के लिए पर्याप्त था। नसीराबाद के क्रांतिकारी सीधे दिल्ली चले गए। यदि वे दिल्ली न जाकर अजमेर मुख्यालय जाते और वहाँ स्थित शस्त्रागार पर कब्जा कर लेते तो शायद क्रांति का स्वरूप कुछ और ही होता।
6. प्रिचार्ड ने पुस्तक “द म्यूटिनी इन राजस्थान” में विचार व्यक्त किये हैं कि यदि अजमेर पर विप्लवकारियों का अधिकार हो जाता तो राजस्थान के शासक उनके सहयोगी बन जाते।
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